Dr. Akhtar Khatri

आ जाओ अब

जब नज़रें पहेली बार मिली थी, उस पल की कसम है,
और उल्फ़त की कली खिली थी, उस पल की कसम है ।

बाहों में बाहें डाल कर, पा लिया था हमने सब कुछ,
सारी ज़िन्दगी हमने जी ली थी, उस पल की कसम है ।

गंवारा नहीं थी एक पल की जुदाई भी, हमे उस वक़्त,
साथ निभाने की कसमें खा ली थी, उस पल की कसम है ।

लोगों ने बहोत कुछ कहा, पर तुम कुछ नहीं बोले जब,
अपनी ज़ुबान को तुमने सी ली थी, उस पल की कसम है ।

लौट आओ की ज़िंदा हो तुम भी, ज़िंदा है ‘#अख़्तर’ भी,
ख़्वाहिशें ज़हर समज के पी ली थी, उस पल की कसम है ।

-अख़्तर खत्री

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