Poems / कविताए

हो गए

बीड़ी सिगरेट के धुएं भी जाफ़रानी हो गए,
लोग दौलत की बदौलत ख़ानदानी हो गए। 

मैने सहरा की जमीनों को समंदर कर दिया,
मुझसे मिलकर मेरे दुश्मन पानी पानी हो गए। 

वो भी दीवारों के अंदर कैद हो कर रह गया,
हम भी बचपन की कोई भूली कहानी हो गए। 

ज़िन्दगी को अपने अपने तौर पर सब ने जिया,
मिट गए कुछ के निशाँ, और कुछ निशानी हो गए। 

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