Asim Bakshi

गर्मियों की शाम

गर्मियों की शाम
सुहानी होती है
छेड़ दे कोई ग़ज़ल
तो और रूहानी होती है

एहसास तेरे होने का
और तेरा नहीं होना
यह सीधी सी बात
दिल को परेशानी होती है

नज़ारें सब वोही
वोही है सब मंज़र
जो थी कभी हकीकत
क्या ऐसी कहानी होती है

है सब बातें होंठो पर
सब किस्से है याद
ऐसी ढलती शाम
मेरी पलकें भिगोती है !!!

-आसिम बक्षी 

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