Dr. Akhtar Khatri

बगैर

अल्फाज़ मेरे महकते नहीं, तुम्हारे ज़िक्र के बगैर,
ये ग़ज़लें मेरी ज़िन्दा कहाँ, तुम्हारी फ़िक्र के बगैर ।

ख़ुश्बू वो तुम्हारे रूह की मेरे वजूद की वजह है,
सांसें ये चलती नहीं तुम्हारी रूह के इत्र के बगैर ।

मिलें, बिछड़े, फ़िर से मिले, यही तो मुहब्बत है,
मज़ा मुलाक़ात का अधूरा है, लंबे हिज्र के बगैर ।

पाई हमने मंज़िले इश्क़ काफ़ी दिक्कतों के बाद,
कहाँ किसी को कुछ भी मिलता है, सब्र के बगैर ।

इन्ही प्यार की बूंदों से लिखेंगे कहानी, ‘अख़्तर,
कब बरसी है बारिशें पानी से भरे हुए अब्र के बगैर ।

-अख़्तर खत्री

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