Dr. Akhtar Khatri

क्या करूँ

सिर्फ़ तुम हो, ख़याल या ख़्वाब, क्या करूँ ?
तुम अब याद आ रहे हो बेहिसाब, क्या करूँ ?

कोई बसता ही नहीं, तुमसे बिछड़ने के बाद,
ज़हन ये मेरा तुम्ही से है आबाद, क्या करूँ ?

इंतेज़ार का मौसम बिता ही नहीं कभी भी,
रोज़ लग रहा कि आओगे आज, क्या करूँ ?

ख़लिश हर जगह, कमियां हर लम्हे में है,
सूनी ये ग़ज़लें, सूने है अल्फाज़, क्या करूँ ?

अब तो सुन लो तुम इल्तेजा ‘अख़्तर’ की,
रूह अब ये होने को है आज़ाद, क्या करूँ ?

-Dr. Akhtar Khatri

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