Hindi Shayari

Shayri Part 39

बहुत सरल है, किसी को पसंद आना,
कठिन तो है, हमेंशा पसंद बने रहना।

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“तुम मुझे अब याद नहीं आते…

तुम मुझे याद हो गये हो अब……!!

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आज दिल चाह रहा है
इतना मुस्कुराऊँ कि रोने लग जाऊं.

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“खो” देते हैं,
फिर…
“खोजा” करते हैं,
यही खेल हम जिन्दगी भर “खेला” करते हैं. . .

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तुम आओ तो
बारिश बुलाऊ

संग तुम्हारे
भीग जाऊ

इतने करीब
आ जाओ

साँसों से
साँसे सुलगाउ

बुँदे उतरेगी
ज़ुल्फ़ों से

शराब समझकर
पि जाऊं

हवाए पूछेंगी
मुझसे कानोंमें

कौनसे बहाने
तुम्हे छू जाऊं !!!

आसिम !!

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ऐसा नहीं के परदे के पीछे सिर्फ राज़ होते है
कभी कभी वहां हमराज़ भी होते है !

आसिम !

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हवा से कह दो खुद को आज़मा के दिखाये,
बहुत चिराग बुझाती है एक जला के दिखाये।

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ये गुलाब को छुट रहा है पसीना,,
क्या उसने भी देखी कोई हसीना ?

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वक़्त का काम तो गुज़रना है,
बुरा हो तो सब्र करो,
अच्छा हो तो शुक्र करो।

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कमबख़्त ख़यालों ने ज़िन्दा रखा है;
वरना सवालों ने तो कब का मार दिया होता!

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क्या बेचकर हम खरीदें “फुर्सत ऐ “जिंदगी

सब कुछ तो “गिरवी”पड़ा है जिम्मेदारी के बाजार में।

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लब-ए-ख़ामोश का,
सारे जहाँ में बोलबाला है !

वही मेहफ़ूज़ है यहाँ,
जिसकी ज़ुबाँ पे ताला है !!

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दर्द बेचता हूँ, मिला के आँसू आह में !

लोग ख़रीद ही लेते है, किसी अपने की चाह है……

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लफ्जों का इस्तेमाल हिफाजत से करिये,

ये परवरिश के बेहतरीन सबुत होते है !!

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अनुभव एक बेहतरीन स्कूल है,

लेकिन फीस बहुत लेता है।

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एक अरसा हो गया मुझे नशा किये यारा…

सोचा क्यों न आज तेरा नाम अपने लबों पे लाया जाये !!

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ख्वाहीशों के दाम उँचे हो सकते है मगर,
खुशीयाँ हरगीज महंगी नही होती…

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तो क्या हुआ…..
जो दोस्त नहीं मिलते हमसे….

मिला तो रब भी नहीं…
पर इबादत काहां रुकी हमसे..

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खामोशी से सुन लो
अपने खिलाफ बाते,

यकीन मानो वक्त,
बेहतरीन जवाब देगा..

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इक उम्र तक मैं जिसकी जरुरत बना रहा…

फिर यूँ हुआ कि उस की जरुरत बदल गई।

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जब्त कहता है खामोशी से बसर हो जाये,

दर्द की ज़िद है कि दुनिया को खबर हो जाये।

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जो दो लफ्जों की हिफाजत न कर पाए,

उनके हाथों में जिंदगी की किताब क्या देता।

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अब तक न हुई है , न होगी किसी की ये,
वख्त की सुई है , अपनी मनमानी करेगी ये।

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मै ख्वाहिशो मे कैद हूँ….!!

और हकीकतें मेरी सजा है….

इश्क़ का मेरे दोस्त —!!

यही तो मज़ा है…. !!

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मै ख्वाहिशो मे कैद हूँ….!!

और हकीकतें मेरी सजा है….!!

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जीते जी बुझती नहीं है

प्यास कभी ,

शायद इसीलिए…..

अस्थियां गंगा में बहायी जाती है …….

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थोड़ी खुद्दारी भी तो लाज़िम थी,

उसने हाथ छुड़ाया, मैंने छोड़ दिया…..

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तुमको मिल ही गया
कोई बेहतर
मुझसे !
मुझको भी मिल गया
कोई बेहतर
तुमसे !

पर कभी कभी दिल को यूँ भी लगता है …
हम जो इक दूसरे को मिल जाते
तो यक़ीनन वो होता बेहतर
सबसे !

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कीमतें गिर जाती हैं खुद की अक्सर,

किसी को कीमती बनाने में।

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टूटें तो बड़े चुभते हैं…

क्या काँच.. क्या ख़्वाब.. क्या रिश्ते………

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रस्म-ए-उल्फत ही इजाज़त नहीं देती वरना…

हम तुम्हें इस तरह भूलें ,

के तुम भी याद करो।

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गुल तेरा रंग चुरा लाए हैं गुलज़ारों में,

जल रहा हूँ भरी बरसात की बौछारो में|

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ये इत्र की शीशियां बेकार ही इतराती है खुद पर,

रिश्ते तो आप जैसे लोगो से महकते है ….

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रुसवाई का डर है… या अंधेरों से मोहब्बत,

अब चाँद को मैं आँगन में उतरने नहीं देता।

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आज लफ्जों को मैने शाम की चाय पे बुलाया है,

बन गयी बात तो ग़ज़ल भी हो सकती है..!!

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कभी तुम मुझे अपना तो कभी गैर कहते गये,,,,

देखो मेरी नादानी, हम सिर्फ तुम्हे अपना कहते गये…..!

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चमचों की फितरत को अभी तू,

समझा ही कहाँ है ऐ बर्तन….

ये बने ही तुझे खाली करने के लिए हैं।

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न जाने ज़िन्दगी का, ये कौन सा दौर है,

इंसान खामोश है, और
ऑनलाइन कितना शोर है।

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जो-जो बातें पी गया था मैं..

वो सारी बातें खा गयीं मुझे…

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यह चादर सुख की मौला क्यों सदा छोटी बनाता है ,

सिरा कोई भी थामो दूसरा कुछ छूट जाता है।

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चाहे कसूर किसीका भी हो,

लेकिन रिश्ते में आंसू हमेशा बेकसूर के ही बहते है..!!

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तेरी दोस्ती एक नशा है,
तभी तो सारी दुनियां हमसे खफा है,

ना करो हमसे इतनी दोस्ती,
कि दिल हमसे पूछे तेरी धड़कन कहाँ है…

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लफ्ज मै कितने भी खूबसूरत लिख दूँ…

निखार तो तब आता है जब आप दिल से उफ्फ करते है..

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जो नहीं है हमारे पास वो ख्वाब हैं,
पर जो है हमारे पास वो लाजवाब हैं…

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“ज़िन्दगी’……….”जीनी” है तो “तकलीफ’ तो “होगी” ही…!!

वरना,

“मरने” के बाद तो “जलने” का भी “एहसास” नहीं होता साहब…!!

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“ना राख उड़ती है ….. ना धुआँ उठता है….

कुछ रिश्ते यूँ चुपचाप जला करते हैं…!!!

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हर मर्ज़ का इलाज नहीं दवाखाने में…!!

कुछ दर्द चले जाते है,

दोस्तो के साथ मुस्कुराने मे…

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थका है तन मगर यह दिल हमें सोने नहीं देता,

तुम्हारी पीठ का यह तिल हमें सोने नहीं देता।

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धुंआ दर्द बयाँ करता है,,और राख कहानियां छोड़ जाती है,

कुछ लोगों की बातों में भी दम नही होता,

कुछ लोंगो की खामोशियाँ भी निशानियां छोड़ जाती है।

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ख़्वाब रूठे हैं मगर हौसले अभी ज़िंदा हैं…

हम वो शख्स हैं जिससे मुश्किलें भी शर्मिंदा हैं।

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चख लिया इश्क, इत्तेफाक से जिसने,

जुबां पर आज भी उनके दर्द के छाले है…

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वो इक मज़ाक़ जिसे लोग इश्क़ कहते हैं…

मैं उस मज़ाक़ का जुर्माना भर के आया हूँ।

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मौसम का ग़ुरूर तो देखो!!!

तुमसे मिल कर आया हो जैसे….

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लगता है हम ही अकेले समझदार है,

हर बात हमें ही समझाई जा रही है!!

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कुछ अजब हाल है इन दिनों तबियत का…..

ख़ुशी ख़ुशी न लगे और ग़म बुरा न लगे…..

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बैठे हैं बड़ी फुरसत से,

तेरी फुरसत के इंतज़ार मे..!!!

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जब दिल..
ना लग रहा..
हो कहीं..
तब समझिये..
कि दिल लग..
गया है कहीं..!!

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दर्द आँखों से निकला, तो सब ने कहा कायर है ये,

दर्द अल्फ़ाज़ में क्या ढला, सबने कहा शायर है ये।

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“अपनी वफ़ा का इतना दावा ना किया कर,

मैंने रूह को जिस्म से बेवफाई करते देखा है !!”

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मैंने कुछ लफ़्ज लिखे है लहरों पर,

जब दरिया तेरे शहर से गुजरे पढ़ लेना….

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मेरी झोली में कुछ दोस्त और कुछ रिश्ते हैं ,

शुक्र ए मेरे मालिक, उनमे कुछ आप जैसे फ़रिश्ते हैं.!

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भीगे कागज की तरह
कर दिया तूने जिन्दगी को
न लिखने के
काबिल छोड़ा न जलने के…

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मै फिर से गिरूंगा ये ग़लतफ़हमी दूर कर लो…

वो दिल की गलती थी की हम लडखडा से गए थे…

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आँखें भिगोने लगी है अब तेरी बातें,
काश ..
तुम अजनबी ही रहते तो अच्छा होता..

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तुझे शिकायत है कि , मुझे बदल दिया है वक्त ने __ !

कभी खुद से भी तो सवाल कर क्या तू वही है…..?

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वो तो ख़ुशबू है हवाओं में बिखर जाएगा,
मसला फूल का है फूल किधर जाएगा।

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एक ही चेहरे की अहमियत हर एक नजर में अलग सी क्यूँ है,,

उसी चेहरे पर कोई खफा तो कोई फिदा सा क्यूँ है,,,,,,

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बहुत मुश्किल से करता हूँ, तेरी यादों का कारोबार…

मुनाफा कम है, पर गुज़ारा हो ही जाता है.!!!

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जो न देते थे जवाब , उनके सलाम आने लगे…

वक़्त बदला तो, मेरे नीम पे आम आने लगे…

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दिल कर बैठा
बच्चो जैसी ज़िद
तुम सामने हो
तब ही मनाये ईद !!!

आसिम !!

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कितना अजीब है ये फलसफा जिंदगी का ;
दूरियां सिखाती है की नज़दीकियां क्या होती हैं ..

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कुछ अधूरे ख़्वाबों से सुलह कर लेता हूँ,

बस इस तरह रात से सुबह कर लेता हूँ।

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नींद भी नीलाम हो जाती हैं दिलों की महफ़िल में जनाब,

किसी को भूल कर सो जाना इतना आसान नहीं होता…

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न जाने किसने चलाया ये तोहफे देने का रिवाज़.!

गरीब आदमी मिलने-जुलने से डरता है साहब.!!

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हास्य-व्यंग्य की पराकाष्ठा :

तुम तो ऐसे उदास बैठे हो,

जैसे बीबी के पास बैठे हो…।।।

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मुझसे झूठ की उम्मीद ना करो
तुम।,
मैं आईना हूं , सबह का अखबार नहीं….

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