Hindi Shayari

Shayri Part 37

तुम अपने ज़ुल्म की इन्तेहा कर दो,…

फिर तुम्हें शायद कोई

हम सा बेज़ुबाँ मिले ना मिले…

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ये कश्मकश है ज़िंदगी की…कि कैसे बसर करें ……

चादर बड़ी करें या …ख़्वाहिशे दफ़न करे…..

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उनका इल्ज़ाम लगाने का अन्दाज़ इतना गज़ब था…..

कि हमने खुद अपने ही ख़िलाफ गवाही दे दी ..!

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न चादर बड़ी कीजिये,
न ख्वाहिशें दफन कीजिये,
चार दिन की ज़िन्दगी है,
बस चैन से बसर कीजिये…

न परेशान किसी को कीजिये,
न हैरान किसी को कीजिये,
कोई लाख गलत भी बोले,
बस मुस्कुरा कर छोड़ दीजिये…

न रूठा किसी से कीजिये,
न रूठा किसी को रहने दीजिए,
कुछ फुरसत के पल निकालिये,
कभी खुद से भी मिला कीजिये…

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दुआ करो, मैं कोई रास्ता निकाल सकूँ..

तुम्हें भी देख सकूँ, खुद को भी सम्भाल सकूँ…

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आईने से इतना मुंह चुराते हो

रूह से थोड़ा संवर क्यों नही जाते..

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तमाम गिले-शिकवे भुला कर सोया करो यारो….

सुना है मौत किसी को मुलाक़ात का मौका नही देती…

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रिश्ते काँच सरीख़े हैं,
टूट कर बिखर ही जाते हैं…

समेटने की ज़हमत कौन करे,
लोग काँच ही नया ले आते हैं…

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इश्क़ इक ख़तरा है मेरे दोस्तो,
और मुझे लगता है मेैं ख़तरे में हूं…

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इश्क़ में ये दावा तो नहीं है मैं ही अव्वल आऊंगा
लेकिन इतना कह सकता हूं अच्छे नम्बर लाऊंगा

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जाती सर्दियां
आती गर्मियां
एक मौसम
रहता है
तेरे मेरे
दरमियाँ !!

-आसिम

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सांस के साथ
अकेला चल रहा था..

सांस गई तो
सब साथ चल रहे थे

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मुद्दतें लगीं बुनने में ख्वाब का स्वैटर..

तैयार हुआ तो मौसम बदल चुका था।

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लिखो तो कुछ इस तरहा कि..

पन्नों पर नाम और
दिल में जगह बरकरार रहे!!

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महफ़िल लगी थी बद-दुआओं की,

हमने भी दिल में कहा !

उसे इश्क़ हो…..उसे इश्क़ हो…. उसे इश्क़ हो……..!!

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बिन धागे की सुई सी बन गई है ये ज़िंदगी…….

सिलती कुछ नहीं……..

बस चुभती चली जा रही है….

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हसरत पूरी ना हों तो ना सही….

ख्वाहिश करना कोई गुनाह तो नहीं….!!

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जाने कैसे गुज़ार दी मैंने

ज़िंदा होता , तो मर गया होता

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वक्त-वक्त की बात है…

कल जो रंग थे,
आज दाग हो गये।

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जिस्म आया किसी के हिस्से में ….
दिल किसी और की अमानत है ….

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मेरे आईने में तुम दीखते हो

कभी ले जाकर तसल्ली कर लेना !!

आसिम !!

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ज़िन्दगी सारी उम्र संभलती रही दो पाँव पर…

मौत ने आते ही कहा.. मुझे चार कँधे चाहिए…

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एक ‪ज़ख्म‬ नहीं यहाँ तो सारा ‪वजूद‬ ही ज़ख्मी है,

दर्द भी ‪हैरान‬ है की उठूँ तो कहाँ से उठूँ !!

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खुद पुकारेगी मंज़िल तो ठहर जाऊँगा…
वरना मुसाफिर खुद्दार हूँ, यूँ ही गुज़र जाऊँगा…।

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बड़ी होशियारी से मैंने ये भी पाप किया…
कि पाप के घड़े में ही छेद कर दिया…

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कौन कहता है के तन्हाईयाँ अच्छी नहीं होती…

बड़ा हसीन मौका देती है ये ख़ुद से मिलने का…

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रास्ता इक नया बनाता हूँ…

जब कोई रास्ता नहीं देता…

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बिना बुलाए आ जाता है कोई सवाल ही नही करता…

ये तेरा ख्याल भी… मेरा ख्याल नही करता… !!!

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डरते हैं तुमसे….. कुछ कहने से……

और रोज मरते हैं ….ना कहने से…

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रात तकती रही आंखों में , दिल आरजू करता रहा ,
कोई बे सबब रोता रहा , कोई बे खबर सोता रहा ….!!

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सब कहते है
रात हो तो नींद आती है
सब की बातें छोडो
मेरी कहाँ चली जाती है !

शब्बा खैर

आसिम !!!

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शोहरतें बदल देती हैं रिश्तों के मायने…

मुकद्दर किसी को इतना भी मशहूर ना करे.

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बहुत ख़ास हैं वो लोग
इस दुनिया में….

जो वक़्त आने पर,
वक़्त दिया करते हैं…

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संभल के चलने का सारा ग़ुरूर टूट गया…

कुछ ऐसी बात कही उसने लड़खड़ाते हुए…

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किसके लिए जन्नत बनाई है तूने ऐ खुदा
कौन है इस जहाँ में जो गुनाहगार नहीं है

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शरारतें करने का मन अभी भी करता है, ….

पता नहीं बचपना जिंदा है या अधुरा है!! …..

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दिल की बातें खुल जाएंगी…
कोई सही चाबी तो लगाए..

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एक ऐसी सुबह होनी चाहिए

मेरी ग़ज़लें

और तेरी ज़ुबाँ होनी चाहिए !!

आसिम !!

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मेरे ऐबों को तलाशना बंद कर दिया है लोगों ने,

मैंने तोहफ़े में उन्हें जब से आईना दे दिया है…

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या तो खरीद लो ….. या खारिज़ कर दो मुझे,

यूँ सहूलियत के हिसाब से, किराये पर मत लिया करो मुझे…

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आवाज़ ! फूंक के मिजाजःपर इतराती हे ,

वरना, बांसुरी तो बहुत सस्ती मिलती है .।।

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सुना है अब अपनी मर्ज़ी से मरा जा सकता है ..

जिया भी जा सकता तो कितना अच्छा होता…

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मोहब्बत से गुज़रा हूँ
अब मयख़ाने में जाना है,

दोनों का असर एक ही है,
बस होश ही तो गंवाना है.

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बचपन कि ख्वाहिशें आज भी “खत” लिखती हैं मुझे…….,

शायद बेखबर इस बात से हैं की
वो जिंदगी अब इस “पते” पर नही रहती।

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आँसू वो खामोश दुआ है..

जो सिर्फ़ खुदा ही सुन सकता है..!!

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फूल और दिल एक से हैं,

तकलीफ दो, तो मुरझा जाते हैं…

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चांद अगर पूरा चमके तो उसके दाग़ खटकते हैं,

एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़तदारों में…..

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हमें…अच्छा नहीं लगता….

तुम्हें अच्छा लगे कोई…

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ख़ुद्दारी वजह रही कि ज़माने को कभी हज़म नहीं हुए हम,

पर ख़ुद की नज़रों में, यकीं मानो, कभी कम नहीं हुए हम!

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ख़ामोशी का अपना मज़ा है,
पेड़ों की जड़े फड़फड़ाया नहीं करतीं..।

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ऐसा लगता है नाराज़गी बाक़ी है अभी…

हाथ थामा है मगर दबाया नहीं उसने..

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वक़्त का सितम तो देखिए…

खुद गुज़र गया …हमें वहीं छोड़ कर…

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फ़ुरसत अगर मिले तुम्हे, तो कभी मुझे भी पढ़ना ज़रुर,
मैं नायाब उलझनों की मुक्कमल किताब हुँ।

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मैं ने भी देखने की हद कर दी..

वो तस्वीर से निकल आई..!!

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मेरे शब्दों की उम्र बस इतनी

तेरी नज़रों से शुरू …तेरी मुस्कान पे खत्म..

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खुद से नहीं हारें
तो अवश्य जीतेंगे

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